आदि शंकराचार्य द्वारा रचित आनन्द-लहरी
आदि शंकराचार्य द्वारा रचित आनन्द-लहरी
आनन्द-लहरी आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। यह सौन्दर्य-लहरी का प्रथम भाग माना जाता है, जिसमें माँ भवानि (पार्वती/त्रिपुरसुन्दरी) के सौन्दर्य, महिमा और कृपा का वर्णन है। इसमें लगभग १८-२० श्लोक हैं (कुछ संस्करणों में थोड़ा भिन्नता हो सकती है)। यह स्तोत्र भक्ति, सौन्दर्य-वर्णन और आध्यात्मिक लाभ के लिए जाना जाता है।
श्लोक १
संस्कृत: भवानि स्तोतुं त्वां प्रभवति चतुर्भिर्न वदनैः प्रजानामीशानस्त्रिपुरमथनः पञ्चभिरपि । न षड्भिः सेनानीर्दशशतमुखैरप्यहिपतिस्तदान्येषां केषां कथय कथमस्मिन्नवसरः ॥१॥
हिंदी अनुवाद: हे भवानि! प्रजापति ब्रह्माजी अपने चार मुखों से भी तुम्हारी स्तुति करने में समर्थ नहीं हैं। त्रिपुरविनाशक महादेव (शिव) पाँच मुखों से भी तुम्हारा स्तवन नहीं कर सकते। कार्तिकेय छः मुखों के साथ भी असमर्थ हैं। नागराज शेष हजार मुखों से भी तुम्हारा गुणगान नहीं कर पाते। फिर अन्य लोगों की तो बात ही क्या? तुम्हीं बताओ, इनकी यह दशा है तो दूसरे किसी को तुम्हारी स्तुति का अवसर कैसे मिल सकता है? ॥१॥
श्लोक २
संस्कृत: घृतक्षीरद्राक्षामधुमधुरिमा कैरपि पदैर्विशिष्यानाख्येयो भवति रसनामात्रविषयः । तथा ते सौन्दर्यं परमशिवदृङ्मात्रविषयः कथङ्कारं ब्रूमः सकलनिगमागोचरगुणे ॥२॥
हिंदी अनुवाद: घी, दूध, अंगूर और मधु की मधुरता को किसी भी शब्द से विशेष रूप से नहीं बताया जा सकता; उसे तो केवल जीभ (रसना) ही जानती है। इसी प्रकार तुम्हारा सौन्दर्य केवल परमशिव (महादेव) के नेत्रों का विषय है। हम इसे कैसे वर्णन करें? हे देवि! तुम्हारे गुणों का वर्णन तो समस्त वेद भी नहीं कर सकते ॥२॥
श्लोक ३
संस्कृत: मुखे ते ताम्बूलं नयनयुगले कज्जलकला ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता । स्फुरत्काञ्ची शाटी पृथुकटितटे हाटकमयी भजामि त्वां गौरीं नगपतिकिशोरीमविरतम् ॥३॥
हिंदी अनुवाद: तुम्हारे मुख में पान है, दोनों नेत्रों में काजल की पतली रेखा है, ललाट पर केसर (काश्मीर) की बिंदी सुशोभित है, गले में मोतियों की लड़ी चमक रही है, और कमर के निचले भाग में सुनहरी साड़ी है जिस पर रत्नमयी करधनी (मेखला) चमक रही है। ऐसे वेष-भूषा से सजी गिरिराज हिमालय की गौरवर्णा कन्या (गौरी) को मैं निरंतर भजता हूँ ॥३॥
श्लोक ४
संस्कृत: विराजन्मन्दारद्रुमकुसुमहारस्तनतटी नदद्वीणानादश्रवणविलसत्कुण्डलगुणा । नताङ्गी मातङ्गीरुचिरगतिभङ्गी भगवती सती शम्भोरम्भोरुहचटुलचक्षुर्विजयते ॥४॥
हिंदी अनुवाद: जिनके स्तनों पर पारिजात (मन्दार) पुष्पों की माला सुशोभित है, वीणा के मधुर नाद को सुनते हुए जिनके कानों में कुण्डल शोभा पा रहे हैं, जिनका शरीर झुका हुआ है, हाथी की तरह जिनकी मनोहर चाल है, और जिनके नेत्र कमल के समान चंचल हैं—वे शम्भु (शिव) की सती पत्नी भगवती सर्वत्र विजयी हों ॥४॥
श्लोक ५
संस्कृत: नवीनार्कभ्राजन्मणिकनकभूषापरिकरैर्वृताङ्गी सारङ्गीरुचिरनयनाङ्गीकृतशिवा । तडित्पीता पीताम्बरललितमञ्जीरसुभगा ममापर्णा पूर्णा निरवधिसुखैरस्तु सुमुखी ॥५॥
हिंदी अनुवाद: जिनका शरीर नवोदित सूर्य के समान चमकते मणि और स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत है, मृगी के समान जिनके सुन्दर नेत्र हैं, जिन्होंने शिव को पति रूप में स्वीकार किया है, बिजली के समान पीत प्रभा वाली, पीताम्बर से सुशोभित मञ्जीर (पायल) धारण करने वाली—वे पूर्ण आनन्द से भरी सुमुखी अपर्णा मुझ पर कृपा करें ॥५॥
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